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माेर दाइ ……. (एक दर्दभरल कहानी) जरूर पर्हाे

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2026-04-11 07:57:00
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मोर दाइक अक्के थो किल आँखी आहे । जेहका कारण मैं अपन दाइ केहें बोहत घृणा करतुँ । मोर दाइक अक्के थो आँखी के कारण उ मोरिक लाज आउ बेजति के पात्र बनल आहे ।
परिवारके लालन पालन आउ मोर पढाई खर्च मे सहयोगके तहन उ एकथो स्कुल में झारु पोँछा लगैना काम करे ।
जने का करे एक दिन मोर दाई, मोर पढ्ना स्कुल में मोर हाल खबर पुछे, मोर नाम लहती स्कुलमे भेट करे आइल ।
मोर दाइक एकथो किल आँखी हे कैहके मोर संघरिया भरिन केहको फे पता नाइ रेहे । तभे मारे मोहके एकदमे लाज लागे । बेकार मे मोर दाइ स्कुल में मोहके भेट करे काही आइल ?
मै दाइ केहें अक्को वास्ता नाइ करनुँ, उही समय स्कुलमे आइल के कारण दाइ केहेँ बहुत घृणा ति देखे आउ मैं हुँवा ति दिक्कैति दाइ ति दुर भागे ।
औरे दिन मोहके स्कुल मे मोर कक्षा में पह्रैया संघरियाभर केहे लगनें छि छि …… तोर दाइक ते अक्के थो आँखी (कानी) आहे । हँस हँस के मजाक उराइ लग्ने ।
संघरिया भरिन के बात सुन्ती की उही समय यी धर्ती बरे जोर ति हले कसा लागल, मोहके धर्ती फटके हिराइ कसा लागल, आउ मैं सोंचे कि… अबती मोर दाई मोर नजर मे कबु नाइ परे कैहके चहनुँ ।
तभे मारे मैं दाइ केहें कहनु …. कि तै मोर जब फे लाज करैते । तैं काही नाइ मर जिते ।

तब मोर दाइ कुछु नाइ मनकता, चुपाइल रैह जिता ।
मैं दाइ केहे का का कहनु कैहके, मै अक्कु नाइ सुच्नु, का करे कि मैं बहुत जोर दाइक ति दिक्काइल रहुँ ।
मैं मोर बात ति दाइ केहें कैसन असर, चिन्ता परल हुइ कैहके मोहके कुछ मतलबे नाइ रहल । आउ जरुरी फे नाइ लागल ।
मै उ घर ति बाहिर जाइक चाहे लग्नु, आउ मोर घर, मोर दाइक ति कुइ मेरके सम्बन्ध नाइ रेहे कहना चाहे लागे ।
तभे मारे मैं बहुत जोर ति मेहनत करके पर्हे, आउ छात्रबृत्रि पाके मैं शहरमे जाके पर्हना मौका फेकुन पैनुँ ।
पार्हा उरबाके नौकरी करनुँ , अपन बेह करनुँ आउ शहर में अपन घर किन्नु । आउ मोर बाल बच्चा फेकुन हुइनें ।
मोर सफल जीवन, मोर बाल बच्चा भर, मोर मेहरुवा, आउ मोर सुख सुबिधा वाला जीबन ती मैं बहुत खुशी रुहूँ ।
मोर छोट मेहका पुरान घर, मोर दाइ आउ औरे नातपात भरिन सम्झना मोर अक्को समय नाइ रेहे । अचानक एक दिन मोर दाई मोहके भेट करक तहनी शहर में आइगेल ।
दाइ मोहके बुहते साल ति दिखले नाइ रेहे, मोर मेहरुवा, अपन नाती पोता भरिन फेकुन नाइ दिखले रेहे । यहाँ तका मोर बेह हुइल, आउ मोर लरका बच्चा हुइल तका पता नाइ पैले रेहे ।

जब उ मोर घरके ढोका तिया आइल मोर लरकाभर वहके देखके हाँसे लगनें । तब मोर लरका का देखके हाँसत हीं कैहके मै फेकुन बाहिर देखे जाबे, एक थो किल आँखी रहल, पुरान कपरा लगलै मोर दाई …….।
मोहके बहुत जोर दिक लागगेल । बिना पता करले, बिना बुलैले मोर घर आइल के मारे मैं दाइ केहेँ बहुत जोर ति गरिनुँ ।
मैं दाइ केहें गरिनुं कि…… तै बिना पतक मोर घर का करे अइले ? मोर लरका बच्चा भरिन डरपैना तैं हिम्मत कैसै करले ? एक घचिक फेकुन तैं हियाँ नाइ रौह …… अब्बे कि अब्बे मोर घर ति चलजा…… जल्दी भागजा ।
मोर बात सुनके मोर दाई धिरे ति कहल …. मोहके माफ करदे पुतुवा, शायद मैं गलत ठेगाना में आइ गिनुँ । अत्रा कैहके मोर दाइ हुवा ति चलगेल ।
मोर घर ति फिर्ता चलगेल बाद मैं अपन मेहरुवा आउ लरका बच्चा भरिन ति उ बुर्हाइल मेहरुवा मोर अपन दाइ हे कैहके केहको फेकुन नाइ बतैनुँ ।
एकदिन मोर पुरान गाउँक स्कुलमे पुरानी बिद्यार्थी भेटघाट के कार्यक्रम रेहे । आउ मोहके कार्यक्रम में जैसे फेकुन आइ परी कैहके निउता आइल रेहे ।
काम के शिलशिला में मैं बाहिर जाइत हुँ कैहके अपन मेहरुवा आउ लरका बच्चा भरिन ठगनुँ । आउ बहुत बरस पाछे अपन पुरानी पर्हल गाउँक स्कुलके बिद्यार्थी संघरिया भरिन भेट करक तहनी अपन गाउँ आइजाबे ।
स्कुल के भेटघाट कार्यक्रम उराइल पाछे मोहके पुरानी घर आउ एकथो बुर्हाइल दाइक याद आइल, आउ मैं एक घचिक जाउँ कैहके पुरान झुपरि घैं चलजाबे ।

पुरान झुपरीमें केहको नाइ देखे, तब हुका रान परोस केहें अपन दाइक बारेम पुछे । परोसी भर बतैनें,…. कि उ ते मर गिने बिचारी ।
यि सब बात सुनके फेकुन मोहके खासे कुछ फरक नाइ परल…. मोर आँखी मेहती एक बुँदा आँस नाइ गिरल …… । खाली सुच्नुँ किल कि….. एक चोट भेट हुइ जितुँ ते …. मूल ठिके हुइल ….. पस्तैना फेकुन का आहे दाइ ति …… जा हुइल ठिके हुइल !
यिही बात मनमें खिलैति खिलैति एक थो परोसी आके मोहके एक थो चिठ्ठी दैके गेल । जौन चिठ्ठी मोर दाई मोहके दहक चाहल रेहे ।
जौन चिठ्ठी में लिखल रेहे “मोर बन्ना सुग्घर पुतुवा…… मै तोर बारेमें हरदम चिन्ता करुँ, दिनरात सोँचुँ । तोर खुशी में अपन खुशी महशुस करना चाहुँ । तौ फेकुन तै मोहके बिसरैले से फे शहर में आके मैं अपना पुतुवा, पतुहिया, पोता पोती भरिन भेट करक आउ देखक चहले रुहूँ । तभेमारे मैं शहर तोर घर गेल रुहूँ ।
मोर पुतुवा…….. मोर नियत नाइ रेहे तोर लरका बच्चा भरिन डरपैना, आउ तोर लाज के बिषय बन्ना । मूल जब मैं तोर मुहति उ बचन सुन्नु कि मोर घर ति अब्बे कि अब्बे चलजा ….. भागजा …., तब मोहके एक घचिक फेकुन हुँवा रुकास नाइ लागल । आउ मैं तोर शहर के घर ति लौत के यिही तुतल पुरान झुपरी में आके अपन मरना दिन गनके बैठल आहुँ । शहर में आके मैं तोर लरका बच्चा भरिन डरपाइलके माफी चाहत हुँ पुतुवा …..।
जब मैं पता पैनुँ कि तैं अपन पुरान स्कुलके बिद्यार्थी संघरिया भेटघाट कार्यक्रम में आइत बाते कैहके तौ मैं बहुत खुशी हुइनुँ ।

मैं बहुते कमजोर हुइगेल हुँ पुतुवा…. जबसम तैं मोहके देखे अइबे तबसम शायद यि बिस्तरा मेहती नाइ उठ पैमुं पुतुवा …। तोर बन्ना हुइत सम मै तोर लाज के मनैं बनल रुहूँ वहका तहनी मोहके माफ करदिए मोर पुतुवा ….।
तोहके पता हे पुतुवा ? ….. जब तैं चुनिमुनी रेहे, एकथो दुर्घटनामें परके तोर एकथो आँखी फुट गिला ।
दाइ हुइलके कारण, तोर अक्के थो आँखी रहल, तोहके बन्ना हुइल मैं देखे नाइ सक्तुँ । उही कारण ती मैं अपन एकथो आँखी तोहके दहनु । आउ मोर अक्केथो किल आँखी रैहगेल ।
मैं मोर पुतुवाक पर एकदम गौरव करतुँ जौन मोर ठाउँ में उ आँखी लैके मोर तहनी नयाँ संसार देखके अपन सफल जीन्दगी जियत आहे ।
तोर आउ तोर परिवारके उज्वल भविष्य आउ सुख शान्ती, प्रगतीके कामना करती मोर प्रेमके साथ तोर तहनी यि अन्तिम उपहार । बिदा हुइती …….. उही तोरीक दाइ……. ।”

 

लेखक : जनक कठरिया (जे.के)

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